इश्क़-ए-दरिया में गोते लगाना मगर ,
सोच करके इसे पार जाना भी है ।
ज़िंदगी शायरों की ग़ज़ल बन गई ,
हर क़दम पे इसे गुनगुनाना भी है।।
अबतो शाया भी मुझसे लगा रूठने,
शाम होते ही जानें कहाँ जाता है ।
यह ज़माने का जौहर हो या हो सितम,
फिर से रूठे हुओं को मनाना भी है ।।
शुक्रिया तुमको लख-लख मेरे हमसफ़र ,
छोड़ना हाथ से अब न पतवार को ।
तुम खिवैया हो जीवन की नैया के जब,
पार कर लेंगे सागर की मझधार को।।
**पथिक