वो दोस्त हों जो साथ चलते जरूरी नही
वो सुखी हों जो दिखते हंसते जरूरी नही
सबकी मजबूरियां थी निभाते रहे
रिश्ते अच्छे ही निभते जरूरी नही
वक्त जैसा भी गुजरे बिताते चलो
दिन अच्छे गुजरते जरूरी नही
इस उम्मीद से उसने धक्का दिया
लोग गिर के सम्भलते जरूरी नही
ढंग जीने का सबका अलग है यहां
सब सलीके से रहते जरूरी नही
जो तारीफ करते हैं मुँह पे मेरी
मुझको अच्छा समझते जरूरी नही
मेरे मरने पे भीड़ आयी रोये सभी
आंसू सच्चे टपकते जरूरी नही
शालिनी शर्मा
ग़ाज़ियाबाद
वो सुखी हों जो दिखते हंसते जरूरी नही
सबकी मजबूरियां थी निभाते रहे
रिश्ते अच्छे ही निभते जरूरी नही
वक्त जैसा भी गुजरे बिताते चलो
दिन अच्छे गुजरते जरूरी नही
इस उम्मीद से उसने धक्का दिया
लोग गिर के सम्भलते जरूरी नही
ढंग जीने का सबका अलग है यहां
सब सलीके से रहते जरूरी नही
जो तारीफ करते हैं मुँह पे मेरी
मुझको अच्छा समझते जरूरी नही
मेरे मरने पे भीड़ आयी रोये सभी
आंसू सच्चे टपकते जरूरी नही
शालिनी शर्मा
ग़ाज़ियाबाद
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