Monday, 16 May 2022

दुनिया गम का एक समुन्दर

 दुनिया गम का एक समुन्दर

जहां दफन हर आस है

जहां देखिये जिधर देखिये

पीडा़ओं का वास है

उम्मीदो के खंडहर है

कब्रो में लाचारी है

घोर निराशाओं के वन 

फिरते हर ओर शिकारी हैं

यहां विवशता के जालो में

कैद मकड़िया मरती है

सड़ी गली मर्यादाये

सड़को पर क्रन्दन करती हैं

            शालिनी शर्मा भारत मां के उन वीरो को नमन जो घर नही आते हैं

देश की रक्षा में जो अपना सब अर्पण कर जाते हैं


देश सुरक्षा की खातिर ये वीर जान दे देते हैं

नमन उन्हे है जो शहीद हो अपना लहू बहाते हैं


आसमान हो या धरती हो या हो जल की गहराई

जल में,थल मेंऔर वायु में सैनिक शौर्य दिखाते हैं


लेह,सियाचिन के बर्फीले तूफानो को सहते हैं

और तिरंगा बर्फ की ऊंची चोटी पर फहराते हैं


दुश्मन की ललकार पे सीना ताने आगे बढ़ते हैं

नही दिखाते पीठ वो गोली सीने पर ही खाते हैं


अगर आँख दिखलाये दुश्मन, या धोखे से वार करे

तब दुश्मन के घर घुस जाते हैं और उसे मिटाते हैं

                          शालिनी शर्मा

 नजरे मिला नजर से, नजरो से कुछ कहा

शायद जुंबा से कहने को बाकी न कुछ रहा

घर जल रहा था मेरा और तेज थी हवा 

दे दी दुआ किसी ने कोई ले रहा मजा

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 उलझनो को न चेहरे पे लाया करो

गम सभी को न अपने बताया करो

रोते चेहरे किसी को भी भाते नही

इस लिए हर समय मुस्कुराया करो

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 नही खरीदी जा सकती पैसो से यहाँ तमीज कोई

गुणवत्ता के बिना फसल अच्छी न देगा  बीज कोई

संस्कार मिलते अब हमको कुछ ही लोगो के अन्दर

स्वाभिमान से बढ़़, न इस दुनिया में अच्छी चीज कोई

                शालिनी शर्मा

तू मेरी आँखों का तारा 

तू है मेरा राज दुलारा

तुझे चूम कर मैं पुचकारूं

अखिंयों से मैं नजर उतारूं

तुझ पर जाऊं मैं बलिहारी

तू है फूल खिली फुलवारी

तू ही है मेरा संसार

तुझ पर आता मुझको प्यार

सदा रहे तू खुश,आबाद

ले ले माँ का आशिर्वाद

तू मेरा छोटा सा ललना

नाम मेरा रोशन तू करना

तुझसे हो मेरी पहचान

मुझे दिलाना तू सम्मान

               शालिनी शर्मा

भरे पेट वाले ही कमियां थाली में गिनवाते हैं

जिन्हे रोटिया नही मयस्सर वो जूठन भी खाते हैं


एक तरफ तो महफिल में महलों में सजी हैं दीवारे

और कहीं पर सर्द रात में कुछ न तन ढक पाते हैं

                         

ये विकास कुछ का ही होता ह्रास सहे बाकी जनता

भरी तिजोरी वाले बस सुविधा का लाभ उठाते हैं


कहां हुई है खत्म कुरीति आज भी दूल्हे बिकते हैं

पिता बेटियों की शादी की फिक्र में सो नही पाते हैं


इन्हे देखिये इन आँखों का नीर नही थम पाता है

दहशतगर्द चिराग बुझा गये घर का ये  बतलाते हैं


व्यापारी जो बड़े यहां पर उन्ही का फलता है व्यापार

छोटे व्यापारी तो लागत तक निकाल न पाते हैं

  

जागीरदारी खत्म हो गई है पर शोषण नही रूका

यहां आज भी कुछ अमीर निर्धन के हक खा जाते हैं

                        शालिनी शर्मा 

माँ जैसा कोई नही ,  माँ तो है अनमोल

माँ की ममता को नही,कोई सकता तोल


माँ जीवन की भोर है,माँ है सुख की नींद

माँ जीवन का सार है,माँ मिश्री का घोल


माँ मूरत है प्यार की,बच्चा उसकी जान

बार बार लगती गले, चूमें  लाल कपोल


मित्र सखा है दोस्त हैं,समझे सब जज़्बात

हर लेती है पीर  सब, मन की खिड़की खोल 


माँ का आंचल छांव दे,हिम्मत देता साथ

माँ की कोशिश से रहे,बच्चा स्वस्थ सुडोल


मुस्काए दुख में सदा,खोये कभी न धीर

माँ क्या है डर जानना,माँ का हृदय टटोल


माँ मन्दिर  है ईश  है, माँ पूजा का थाल                      

चरणामृत, नैवेद्य  हैं, शुभाशीष के बोल

                                 शालिनी शर्मा

 जीवन के पथ पर उगे,लम्बे लम्बे शूल

राहों  की  दुश्वारियां, बढ़ा  रही है धूल


तूफानों  का  जोर  है, आंधी है पुरजोर

 खतरे में सब है यहां,करलो इसे कबूल


मार पड़ी है वक्त की,हावी हुआ विनाश

घर खंडहर होकर गिरा,हिली द्वार की चूल


भूकम्पो की तीव्रता,हिला रही हैं नींव

तीव्र दरारे बन गई,रहना यहां फिज़ूल


आँखों में आंसू थमें,है दहशत हर और

बुरा समय थम सा गया,समय नही अनुकूल


वक्त साथ देता नहीं, पड़ी आपदा घोर

बाढ़ फसल को खा गई,कैसे दे महसूल


कर्जदार भी मिट गये,बचे न साहूकार

दोनों ही जीवित नहीं,जो ऋण करें वसूल

                                 शालिनी शर्मा

 जल रोता है चीख चीख कर ,कोई मुझे बचाओ

मैं जीवन देता हूंँ तुमको,व्यर्थ न मुझे बहाओ


जो नल खुला छोड़ के मुझको बहा रहे हैं नाली में

उन्हें पता नही मेरी कीमत,तुम उनको समझाओ


खत्म मुझे कर दोगे गर तो ऐसा न हो जाये

आने वाले समय में मेरी एक बूंद न पाओ


गर्मी में बेहाल  जानवर  मुझे  ढूंढ़ते  घूमें

निरिह प्राणियों को पानी दे इनकी प्यास बुझाओ


जल का संचय बहुत जरूरी,वर्षा का जल भर लो

जल का संचय करने को सीमेंन्ट के टैंक बनाओ


कोई फसल बिना पानी के जीवित नहीं बचेगी

पेड़ और पोधो को पानी समय पे खूब पिलाओ 


भूमि का उपजाऊपन गर रखना तुम्हें है कायम

दूषित जल खेतों,नदियों में भी न कभी बहाओ 

                             शालिनी शर्मा

दारू तो न देसी अच्छी और न सही विदेशी

दारू पीने वालों से तो अच्छे यहां मवेशी

गाड़ी नहीं चलाना दारू पीकर कभी सड़क पर

वरना यम के दफ्तर में हो जाते कहीं न पेशी

‌।                                  शालिनी शर्मा

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