Saturday, 8 November 2014

KATI PATANG

नीलगगन सुन मेरे जीवन की ये अन्तिम भोर है 
हूँ पतंग मैं ऐसी जिसकी कटी हुई डोर है 
     आसमान में जब होती हूँ 
     इठलाती बलखाती हूँ 
      पवन के झोंकों के संग 
      झूम झूम मैं कमर हिलाती हूँ 
मैं हूं आसमान में नीचे लोग मचाते शोर हैं 
हूँ पतंग मैं --------------------------
        बिना सहारे राह ना सूझे 
        इत जाऊं या  उत जाऊं 
        डोर बिना मैं भंवर के जल में 
        भय के अब गोते खाऊँ 
राही हूँ उस आसमान की जिसका ओर ना छोर है 
हूँ पतंग मैं --------------------------
          नीचे भीड़ देख मुझको 
          लुट जाने का आभास हुआ 
           खेल खेलते रहे खिलाडी 
           पर मेरा सर्वनाश हुआ 
कागज की देह झपट झपट सब आजमाते जोर हैं 
हूँ पतंग मैं -------------------------
                          शालिनी शर्मा 
 

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