नीलगगन सुन मेरे जीवन की ये अन्तिम भोर है
हूँ पतंग मैं ऐसी जिसकी कटी हुई डोर है
आसमान में जब होती हूँ
इठलाती बलखाती हूँ
पवन के झोंकों के संग
झूम झूम मैं कमर हिलाती हूँ
मैं हूं आसमान में नीचे लोग मचाते शोर हैं
हूँ पतंग मैं --------------------------
बिना सहारे राह ना सूझे
इत जाऊं या उत जाऊं
डोर बिना मैं भंवर के जल में
भय के अब गोते खाऊँ
राही हूँ उस आसमान की जिसका ओर ना छोर है
हूँ पतंग मैं --------------------------
नीचे भीड़ देख मुझको
लुट जाने का आभास हुआ
खेल खेलते रहे खिलाडी
पर मेरा सर्वनाश हुआ
कागज की देह झपट झपट सब आजमाते जोर हैं
हूँ पतंग मैं -------------------------
शालिनी शर्मा
हूँ पतंग मैं ऐसी जिसकी कटी हुई डोर है
आसमान में जब होती हूँ
इठलाती बलखाती हूँ
पवन के झोंकों के संग
झूम झूम मैं कमर हिलाती हूँ
मैं हूं आसमान में नीचे लोग मचाते शोर हैं
हूँ पतंग मैं --------------------------
बिना सहारे राह ना सूझे
इत जाऊं या उत जाऊं
डोर बिना मैं भंवर के जल में
भय के अब गोते खाऊँ
राही हूँ उस आसमान की जिसका ओर ना छोर है
हूँ पतंग मैं --------------------------
नीचे भीड़ देख मुझको
लुट जाने का आभास हुआ
खेल खेलते रहे खिलाडी
पर मेरा सर्वनाश हुआ
कागज की देह झपट झपट सब आजमाते जोर हैं
हूँ पतंग मैं -------------------------
शालिनी शर्मा

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