इश्क़-ए-दरिया में गोते लगाना मगर ,
सोच करके इसे पार जाना भी है ।
ज़िंदगी शायरों की ग़ज़ल बन गई ,
हर क़दम पे इसे गुनगुनाना भी है।।
अबतो शाया भी मुझसे लगा रूठने,
शाम होते ही जानें कहाँ जाता है ।
यह ज़माने का जौहर हो या हो सितम,
फिर से रूठे हुओं को मनाना भी है ।।
शुक्रिया तुमको लख-लख मेरे हमसफ़र ,
छोड़ना हाथ से अब न पतवार को ।
तुम खिवैया हो जीवन की नैया के जब,
पार कर लेंगे सागर की मझधार को।।
**पथिक
Wednesday, 2 December 2015
Bij boya jahan
जहाँ बोया था बीज, वहाँ जड़ पनप रही है पैसा आते ही अकड़ पनप रही है जो कुछ भी नहीं वो धमकाने लगे क्योंकि सत्ता पे उनकी पकड़ पनप रही है शालिनी शर्मा
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