इश्क़-ए-दरिया में गोते लगाना मगर ,
सोच करके इसे पार जाना भी है ।
ज़िंदगी शायरों की ग़ज़ल बन गई ,
हर क़दम पे इसे गुनगुनाना भी है।।
अबतो शाया भी मुझसे लगा रूठने,
शाम होते ही जानें कहाँ जाता है ।
यह ज़माने का जौहर हो या हो सितम,
फिर से रूठे हुओं को मनाना भी है ।।
शुक्रिया तुमको लख-लख मेरे हमसफ़र ,
छोड़ना हाथ से अब न पतवार को ।
तुम खिवैया हो जीवन की नैया के जब,
पार कर लेंगे सागर की मझधार को।।
**पथिक
Monday, 28 December 2015
PLEASE RESPECT WOMAN
A GREAT PERSONALITY घर तक में नारी ना सुरक्षित ,झूठे सब आश्वासन हैं घर घर में पांचाली है , घर घर में दुष्शासन हैं
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